संदेश

क्या क्रिकेट क्या युद्ध

विश्व कप २०११ के सेमिफिनल में भारत और पाकिस्तान का मुकाबला क्या तय हुआ भारतीय मीडिया को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गयी क्योंकि हमारे यहाँ क्रिकेट और हिंदी सिनेमा जिसे पोपुलर भाषा में बॉलीवुड कहा जाता है के अलावा कुछ और चलता भी कहाँ है ? देश में इस समय ऐसा लग रहा है की क्रिकेट ही हमें सब दुखों से मुक्त कराएगा । इस समय देश की दशा क्या है इस पर गंभीर चर्चा करने की का समय ही नहीं रह गया है, हर मर्ज की एक दवा मनोरंजन और उत्तेजना । हम कब अपने मीडिया को एक गंभीर मीडिया बना पाएंगे ? इसे सिर्फ खेल रहने देना चाहिए इससे अधिक कुछ नहीं

राजसत्ता आजादी और लोकतंत्र

जैसे जैसे देश आगे बढता जा रहा है वैसे वैसे राजसत्ताएँ अधिक से अधिक निरंकुश होती जा रही हैं एक उम्मीद मन में हमेशा से रही है कि यदि देश का राजनितिक वर्ग अगर समझौतावादी हो जाय तो देश की न्याय पालिका देश की जनता को लोकतंत्र के वास्तविक अधिकार दिलवाएगी पर पिछले कुछ समय से न्याय पालिका के अनेक निर्णय जनपक्षधर नहीं लगते हैं । इसके विपरीत सत्ताओं के पक्ष को अधिक से अधिक मान्यता मिलती जा रही है। जनता से उसके हड़ताल जैसे जनवादी अधिकार भी छीने जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि पूरे के पूरे समाज को मात्र हाँ और न करनेवालों में ही बाँट दिया गया है

शादी सेलेब्रिटी और मीडिया

पिछले दिनों जिस प्रकार से भारतीय मीडिया में सेलेब्रेटी शादियों को प्राईम टाइम में समय दिया गया उससे यह बात एकदम साफ़ हो जाती है कि अभी हमारे यहाँ मीडिया अभी भी बाल्यावस्था में ही है । कभी राहुल महाजन तो कभी सानिया मिर्जा कि शादी अभी हाल में धोनी की शादी को लेकर मीडिया जितना उत्साहित दिखा लगा कि रिपोर्टर खुद नाचने न लगे । इस पूरे समय में न देश में महंगाई कोई मुद्दा रहा न गरीबी । हमें इस बात को सोचना चाहिए कि मीडिया का काम सिर्फ मनोरंजन करना न रह जाये । अभी मुझे ज्यां बौद्रिया की बात याद आयी कि टेलीविजन मूल रूप में मनोरंजन का ही माध्यम है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान २००८ प्रज्ञा को

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वर्ष २००८ के भारतेंदु हरिश्चंद्रसम्मान समारोह में डा.प्रज्ञा को उनकी किताब तारा की अलवर यात्रा के लिए प्रथम पुरस्कार से नवाज़ा गया.यह किताब २००८ में एन .सी .ई .आर.टी से प्रकाशित हुई .२९ मार्च २०१० को पुरस्कृत हुई। इस किताब की खासियत है की यह राजस्थान के अलवर शहर की सामाजि क , इतिहासिक ,सांस्कृतिक, परिदृश्य के साथ सरिस्का के माध्यम से जल, जंगल और जमीन के सवाल उठाती है। डा.प्रज्ञा पिछले कई वर्षों से साहित्यिक सामाजिक लेखन में सक्रिय हैं । हिंदी के नुक्कड़ नाटकों पर उनकी किताब ' नुक्कड़ नाटक : रचना और प्रस्तुति वर्ष २००६ में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रकाशित हुई । यह किताब हिंदी में अपनी तरह का पहला प्रमाणिक प्रयास है । वर्ष २००८ में वाणी प्रकाशन ने उनके द्वारा सम्पादित १२ नुक्कड़ नाटकों का संग्रह ' जनता के बीच जनता की बात ' प्रकाशित किया । डॉ प्रज्ञा हिंदी प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों के जरिये हस्तक्षेप करती रही हैं। वर्तमान में दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में एसोसिअट प्रोफेसर हैं.

स्त्री और मीडिया

भारतीय मीडिया परिदृश्य मैं इन दिनों लगातार स्त्री छविओं का प्रयोग समाज के एक परिवर्तन विरोधी रूप को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है । आप जैसे ही टीवी चलते हैं आप हर चैनल पर एक न एक ऐसे धारावाहिक को देख पाएंगे जिस पर कोई न कोई स्त्री केन्द्रित कहानी चल रही होती है । इन कहानिओं का मूल स्वर तो स्त्री समर्थक लगता है पर वास्तव मैं यह सभी धारावाहिक स्त्री कि रक प्रतिगामी छवि को ही पोषित कर रहे होते हैं.

मीडिया की जिम्मेदारी

मीडिया का गैर जिम्मेदाराना रूप हमें पिछले दिनों देखने को मिला