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नवंबर 15, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजसत्ता आजादी और लोकतंत्र

जैसे जैसे देश आगे बढता जा रहा है वैसे वैसे राजसत्ताएँ अधिक से अधिक निरंकुश होती जा रही हैं एक उम्मीद मन में हमेशा से रही है कि यदि देश का राजनितिक वर्ग अगर समझौतावादी हो जाय तो देश की न्याय पालिका देश की जनता को लोकतंत्र के वास्तविक अधिकार दिलवाएगी पर पिछले कुछ समय से न्याय पालिका के अनेक निर्णय जनपक्षधर नहीं लगते हैं । इसके विपरीत सत्ताओं के पक्ष को अधिक से अधिक मान्यता मिलती जा रही है। जनता से उसके हड़ताल जैसे जनवादी अधिकार भी छीने जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि पूरे के पूरे समाज को मात्र हाँ और न करनेवालों में ही बाँट दिया गया है