राजसत्ता आजादी और लोकतंत्र

जैसे जैसे देश आगे बढता जा रहा है वैसे वैसे राजसत्ताएँ अधिक से अधिक निरंकुश होती जा रही हैं एक उम्मीद मन में हमेशा से रही है कि यदि देश का राजनितिक वर्ग अगर समझौतावादी हो जाय तो देश की न्याय पालिका देश की जनता को लोकतंत्र के वास्तविक अधिकार दिलवाएगी पर पिछले कुछ समय से न्याय पालिका के अनेक निर्णय जनपक्षधर नहीं लगते हैं । इसके विपरीत सत्ताओं के पक्ष को अधिक से अधिक मान्यता मिलती जा रही है। जनता से उसके हड़ताल जैसे जनवादी अधिकार भी छीने जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि पूरे के पूरे समाज को मात्र हाँ और न करनेवालों में ही बाँट दिया गया है

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री और मीडिया

भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान २००८ प्रज्ञा को

शादी सेलेब्रिटी और मीडिया